सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर नई दिशा
इंटरव्यू: यदि कोई जीवन दे नहीं सकता, तो छीनने का अधिकार कैसे? हरीश राणा के परिवार के वकील ने हर मुश्किल सवाल का दिया जवाब
Nbt NavbharattimesImage: Nbt Navbharattimes
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में जीवन समर्थन हटाने के संबंध में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं, जिससे समान परिस्थितियों में फंसे परिवारों को सहायता मिलेगी। यह फैसला 'गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार' को मान्यता देता है और भविष्य में ऐसे मामलों में अदालतों के दृष्टिकोण को बदल सकता है।
- 01सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में जीवन समर्थन हटाने की अनुमति दी।
- 02इस फैसले ने 'गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार' को नया रूप दिया है।
- 03मेडिकल बोर्ड की पुष्टि से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की प्रक्रिया सरल होगी।
- 04यह फैसला समान परिस्थितियों में फंसे परिवारों के लिए राहत का स्रोत बनेगा।
- 05कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस संबंध में कानून बनाने का निर्देश दिया है।
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नई दिल्ली में हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जीवन समर्थन हटाने की अनुमति दी, जिससे 'गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार' को मान्यता मिली। हरीश राणा, जो 13 वर्षों तक कोमा में रहे, का निधन लाइफ सपोर्ट हटाने के 10 दिन बाद हुआ। उनके परिवार के वकील मनीष जैन ने बताया कि यह फैसला समान परिस्थितियों में फंसे परिवारों के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश प्रदान करता है। कोर्ट ने कहा कि जब किसी व्यक्ति के ठीक होने की संभावना नहीं होती, तो जीवन रक्षक उपकरण हटाने का निर्णय लेना आवश्यक है। इस फैसले के बाद, मेडिकल बोर्ड की पुष्टि से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की प्रक्रिया सरल होगी, जिससे परिवारों को अदालतों के दरवाजे खटखटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह निर्णय समाज में 'गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार' के दायरे को बढ़ाता है और भविष्य में ऐसे मामलों में अदालतों के दृष्टिकोण को बदल सकता है।
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यह फैसला उन परिवारों के लिए राहत का स्रोत बनेगा जो अपने प्रियजनों को गरिमापूर्ण तरीके से विदाई देना चाहते हैं।
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