भारत की छिपी क्रेडिट समस्या: मौद्रिक हस्तक्षेप और नियामक बाधाएं
भारत की छिपी क्रेडिट समस्या: दिक्कत कीमत और नियमों में
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भारत में बैंकिंग तंत्र में प्रचुर नकदी के बावजूद ऋण बाजार का आकार वैश्विक औसत से काफी छोटा है। मौद्रिक हस्तक्षेप और नियामक बाधाएं स्थिर आय के आकर्षण को कम कर रही हैं, जिससे घरेलू बचत इक्विटी की ओर बढ़ रही है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
- 01भारत का घरेलू ऋण कुल इक्विटी बाजार पूंजीकरण का केवल 60% है, जबकि वैश्विक औसत 115% है।
- 02मौद्रिक हस्तक्षेप से जोखिम-मुक्त दरें कम हो रही हैं, जिससे ऋण निर्माण में बाधा उत्पन्न हो रही है।
- 03नियामक आवश्यकताएं जैसे LCR और NSFR बैंकिंग तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं।
- 04कम घरेलू ब्याज दरें विदेशी निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण बना रही हैं।
- 05एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है जो विभिन्न आर्थिक कारकों को संबोधित करे।
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भारत में बैंकिंग तंत्र में प्रचुर नकदी होने के बावजूद, देश का ऋण बाजार वैश्विक औसत से काफी छोटा है। भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड और विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत का घरेलू ऋण कुल इक्विटी बाजार पूंजीकरण का केवल 60% है, जबकि वैश्विक औसत 115% है। यह स्थिति मौद्रिक हस्तक्षेप और नियामक बाधाओं के कारण उत्पन्न हो रही है, जिससे स्थिर आय के लिए आकर्षण कम हो रहा है और घरेलू बचत इक्विटी की ओर बढ़ रही है। मौद्रिक नीति के तहत, आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026 के लिए 8 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड खरीदने की योजना बनाई है, जिससे बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, इससे जोखिम-मुक्त दरों में कमी आई है, जो ऋण निर्माण को प्रभावित कर रही है। बैंकिंग नियामक आवश्यकताएं जैसे तरलता कवरेज अनुपात (LCR) और शुद्ध स्थिर फंडिंग अनुपात (NSFR) भी बैंकों पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं। इन सभी कारकों के चलते, भारतीय अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक संतुलित और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
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कम घरेलू ब्याज दरें भारतीय निवेशकों को विदेश में निवेश करने के लिए प्रेरित कर रही हैं, जिससे घरेलू बचत में कमी आ रही है।
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