बंगाल में चुनावी पेंटिंग: दीवारों पर सियासत का पुराना जादू
डिजिटल युग में भी बरकरार 'दीवारों की सियासत', बंगाल में चुनावी पेंटिंग का दशकों पुराना जादू
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बंगाल में चुनाव केवल मतदान का उत्सव नहीं, बल्कि दीवार लेखन की जीवंत परंपरा भी है। डिजिटल युग में भी यह परंपरा बरकरार है, जहां दीवारें राजनीतिक रंगों और नारों से सजती हैं। यह न केवल प्रचार का माध्यम है, बल्कि विचार और जनसंवाद का जीवित दस्तावेज भी है।
- 01बंगाल में दीवार लेखन की परंपरा 1960-70 के दशक से शुरू हुई थी।
- 02यह परंपरा चुनावी प्रचार का एक सस्ता और प्रभावी माध्यम है।
- 03दीवारों पर लिखे नारे विचारधारा का सार्वजनिक प्रदर्शन हैं।
- 04बंगाल की 'वाल पालिटिक्स' में रचनात्मकता और स्थानीय भाषा का अद्भुत मिश्रण है।
- 05चुनाव आयोग नियम तय करता है, लेकिन जमीनी सियासत में दीवारों की लड़ाई भी महत्वपूर्ण है।
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बंगाल में चुनावी मौसम में दीवार लेखन की परंपरा एक जीवंत सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। यह परंपरा 1960-70 के दशक में वामपंथी राजनीति के साथ शुरू हुई थी, जब कार्यकर्ता रातों-रात दीवारों पर नारे लिखते थे। आज भी, डिजिटल युग में, दीवारें राजनीतिक संदेशों से भरी रहती हैं। दीवार लेखन न केवल चुनावी प्रचार का साधन है, बल्कि यह विचार और जनसंवाद का एक जीवित दस्तावेज भी है। ग्रामीण इलाकों में यह सबसे सस्ता और प्रभावी प्रचार माध्यम है, जहाँ लिखा हुआ नारा लोगों की बातचीत का हिस्सा बन जाता है। हालांकि, इस परंपरा के साथ विवाद भी जुड़े हैं, जैसे बिना अनुमति दीवारों पर लिखने को लेकर टकराव। चुनाव आयोग नियम निर्धारित करता है, लेकिन जमीनी सियासत में दीवारों की लड़ाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
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दीवार लेखन के माध्यम से, स्थानीय समुदायों में राजनीतिक चर्चा और विचारों का आदान-प्रदान होता है।
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