हाल ही में मैने बहुचर्चित फिल्म धुरंधर 2 देखी. वैसे तो मैं फिल्मों का कोई खास शौकीन नहीं हूं, साल में इक्का दुक्का फिल्में ही देखता हूं वो भी सिर्फ मनोरंजन के लिए. धुरंधर 2 देखने का कारण मनोरंजन के अलावा कुछ और भी था. फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित होने का दावा करती है और इसमें अपराध जगत के असली किरदारों को पेश किया गया है जैसे कि मुंबई अंडरवर्ल्ड का डॉन दाऊद इब्राहिम. इसलिए कई मित्र और पॉडकास्टर लगातार मुझसे संपर्क करके जानना चाह रहे थे कि बताओ इसमें कितनी हकीकत और कितना फसाना है. तो पढ़िए इस फिल्म का नॉन फिल्मी रिव्यू...मेरा मानना है कि हर सिनेमाप्रेमी को धुरंधर जरूर देखनी चाहिए. जिस तरह से फिल्म बनाई गई है उससे इसे ऐतिहासिक सफलता पाने का हक है...लेकिन इस फिल्म को सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिए देखें, ज्ञानवर्धन के लिए नहीं. फिल्म को देखकर ऐसा लगता है कि फिल्मकार ने परोक्ष रूप से अपनी कल्पना को ज्ञान की तरह परोसने की कोशिश की है.दाऊद इब्राहिमफिल्म में भारत के मोस्ट वांटेड दाऊद इब्राहिम को बूढ़ा और बीमार बताया है. 26 दिसंबर 1955 को पैदा हुए शख्स का ये सही चित्रण है. दाऊद बूढ़ा हो चुका है और शायद अब ऐसा ही दिखता है. डी कंपनी के सूत्र कई साल पहले मुझे बता चुके थे कि दाऊद के फेफड़े जर्जर हो चुके हैं. उनके मुताबिक दाऊद शराब नहीं पीता लेकिन चैन स्मोकर रहा है जिसकी वजह से उसके फेफड़े का फालूदा हो चुका है.जो बात दाऊद के बारे में असत्य बताई गई है वो ये है कि दाऊद को भारत में आतंकी साजिशों का रणनीतिकार बताया गया है. बड़े साहब यानी दाऊद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को निर्देश देते हैं कि उसे क्या करना है जबकि हकीकत इससे उल्टा है. दाऊद ISI का प्यादा है, बॉस नहीं. ISI अपनी साजिशों को अंजाम दिलाने के लिए दाऊद की मदद लेती है. 1993 के मुंबई बम कांड के आठ साल बाद तक दाऊद दुबई में रहकर ही ISI की खातिर काम करता था. 2001 में जब अमेरिका में 9/11 के हमले हुए और जब अमेरिका ने दुनियाभर में आतंकियों के खिलाफ जंग छेड़ दी तो दाऊद की हिफाजत के लिए उसे कराची के क्लिफटन इलाफे में लाकर बसा दिया गया जो कि मुंबई के कफ परेड के जैसा है. इसी बीच संयुक्त राष्ट्र ने दाऊद को अंतरराष्ट्रीय आतंकी भी घोषित कर दिया जिससे उसका पाकिस्तान के बाहर जाना दूभर हो गया. आज दाऊद पूरी तरह से ISI के रहमोकरम पर जी रहा है.फिल्म में ये बात सही दिखाई गई है कि हमारी खुफिया एजेंसी ने दाऊद को मारने की कोशिश की थी. हकीकत ये है कि तीन बार ऐसी नाकामयाब कोशिश हो चुकी है. साल 2005 में अजीत डोभाल की ओर से किया गया प्लान उनमें से एक था जो इंटेलिजेंस ब्यूरो और मुंबई पुलिस के बीच गलतफहमी की वजह से अमल में नहीं आ सका. पूर्व IPS अधिकारी मीरा बोरवणकर की आत्मकथा में वो किस्सा पढ़ा जा सकता है. दाऊद के मारने के उन तीनों प्रयासों पर मैं फिर कभी विस्तार से लिखूंगा.नूराफिल्म में दिखाई गई ये कहानी पूरी तरह से बकवास है कि दाऊद के भाई नूरा को रहमान डकैत के गिरोह ने एक जमीन विवाद के चलते मार डाला. फिल्म में बताया गया है कि नूरा भी कराची में दाऊद के आपराधिक गिरोह में शामिल था. दाऊद के इस भाई का असली नाम नूर कास्कर है और 80-90 के दशक में ये बॉलीवुड में गाने लिखता था. इसके कुछ गाने हिट भी हुए जैसे - "कभी लिंकिंग रोड, कभी वार्डन रोड...." 1986 में दाऊद के मुंबई से दुबई भाग जाने के कुछ दिन बाद नूर भी दुबई चला गया और फिर 2001 में दाऊद के साथ कराची. मुंबई में डी कंपनी ने आखिरी बार गोली नूर के कहने पर ही चलाई थी. नवंबर 2002 में नूर का मुंबई के वर्सोवा इलाके में रहने वाले केबल न्यूज के मालिक अली नानजियानी से किसी संपत्ति को लेकर विवाद हो गया. नूर के कहने पर छोटा शकील के शूटरों ने उसे गोलियों से भून दिया. उसके बाद से आज तक डी कंपनी ने मुम्बई में एक भी गोली नहीं चलाई.नूरा को मुंबई में रहते हुए ही किडनी की समस्या हो चुकी थी. मार्च 2009 को इसी बीमारी की वजह से उसकी मौत हुई न कि रहमान डकैत के गिरोह ने उसे मारा. मुझे आज भी मार्च 2009 का वो दिन याद है जब मैं एक कार एक्सीडेंट में दिवंगत हुए अपने सहकर्मी व्यंकटेश चपलगांवकर के अंतिम संस्कार के लिए पुणे गया था. वहीं मेरे मोबाइल पर एक खबरी ने नूरा की मौत की सूचना दी. मैने इसके बाद पुलिस के अपने सूत्रों से खबर को कन्फर्म कर स्टार न्यूज पर उसे ब्रेक कर दिया.यहां ये जान लेना भी जरूरी है कि दाऊद पाकिस्तान में किसी अपराधी की तरह नहीं रह रहा और न कोई गिरोह चलाता है. अब वो रियल स्टेट और होटल के कानूनी धंधे में आ गया है और उसका कारोबार लंदन, दुबई, शारजाह समेत कई देशों में फैला है. कराची में अब वो एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गया है. उसने अपनी बेटी माहरुख की शादी क्रिकेटर जावेद मियांदाद के बेटे जुनैद से करवाने के अलावा अपने भाइयों के बच्चों की शादियां भी पाकिस्तान के रसूखदार लोगों से करवाई हैं.मेजर इकबालये असली किरदार है जो 26/11 के मुंबई हमले की साजिश में शामिल था. ये हमले के वक्त कराची के बाहर बनाए गए कंट्रोल रूम से मुंबई भेजे गए आतंकियों के संपर्क में था. इसका जिक्र पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आरोपी डेविड हेडली के बयान में भी है.अतीक अहमदफिल्म में अतीक अहमद के बारे में जो कुछ भी बताया गया वो सच है. अतीक इंसान की शक्ल में कितना क्रूर राक्षस था इसे आप नेट पर सर्च करके जान सकते हैं. अतीक के केस में गलत सिर्फ टाइमलाइन है. उसकी हत्या नोट बंदी के वक्त दिखाई गई जबकि वो 2023 में मारा गया.कुछ अन्य बिंदुफिल्म की कास्टिंग जबरदस्त है. अजीत डोभाल, असलम चौधरी, अतीक अहमद, नवाज शरीफ, मेजर इकबाल, डेविड हेडली जैसे किरदार असल जिंदगी वाले दिखते हैं, बोलते हैं, चलते फिरते हैं. फिल्म का तीन बार एंड का प्रयोग दर्शकों और फिल्मकार दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हुआ. पहली समाप्ति पर जब क्रेडिट रोल शुरू हो जाता है तब ही 90 फीसदी दर्शक फिल्म खत्म हो गई है, ये मानकर चले जाते हैं और फिल्म के बचे हुए हिस्से को देखने से महरूम रह जाते हैं. फिल्मकार भी इस वजह से अपना बाकी का हुनर उन्हें नहीं दिखा पाता. मुझे मेरे दोस्तों ने पहले ही आगाह कर दिया था इसलिए मैं तीसरी एंडिंग तक हॉल में बैठा रहा.प्रोपेगंडा है या नहीं?फिल्म देखकर तुरंत स्पष्ट हो जाता है कि फिल्मकार ने विशिष्ट पार्टी और विचारधारा को केंद्रित कर नैराटिव गढ़ा है. इसीलिए मैने कहा कि फिल्म को मनोरंजन के लिए देखिए ज्ञानवर्धन के लिए नहीं. इसमें सच और झूठ का मिश्रण है. जो लोग प्रोपेगंडा के नाम पर फिल्म की निंदा कर रहे हैं उनके लिए रामगोपाल वर्मा (अपने "सत्या" वाले) ने सही कहा है- "अगर ये प्रोपेगंडा है तो इस प्रोपेगंडा को झुठलाने के लिए कोई फिल्मकार इससे बेहतर फिल्म बना ले."यह भी पढ़ें: 6 साल में जीता दिल, मिस्टर इंडिया बनी वन एंड लास्ट फिल्म, अब ये बच्ची श्रीदेवी जैसी सुंदर, 38 साल बाद देख फैंस इमोशनल