बिनपुर में आदिवासी वोटरों की भूमिका: क्या कुर्मी समाज और युवा मतदाता बदलेंगे चुनावी समीकरण?
बिनपुर में खामोश है आदिवासी वोटर: क्या कुर्मी समाज और युवा मतदाता बदलेंगे जंगलमहल का सियासी भूगोल?
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बिनपुर, झारखंड में आगामी चुनाव में आदिवासी वोटरों की भूमिका महत्वपूर्ण है। कुर्मी समाज की एसटी दर्जे की मांग और युवाओं की रोजगार की तलाश चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। टीएमसी और भाजपा के बीच मुकाबला 'वर्तमान की राहत' और 'भविष्य की सुरक्षा' के बीच है।
- 01बिनपुर में कुर्मी समाज की आबादी 30-40% है, जो एसटी दर्जे की मांग कर रहे हैं।
- 02युवाओं का पलायन रोजगार की कमी का संकेत है, जिससे चुनाव पर असर पड़ सकता है।
- 03टीएमसी और भाजपा के बीच चुनावी मुकाबला वर्तमान और भविष्य के मुद्दों पर आधारित है।
- 04सीपीएम का पतन भाजपा के उदय का कारण बना है, जिससे राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं।
- 05महिलाओं का रुझान टीएमसी की ओर है, जबकि युवा स्थायी नौकरी की मांग कर रहे हैं।
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बिनपुर, झारखंड में 23 अप्रैल को होने वाले चुनाव में आदिवासी वोटरों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। यहां की कुर्मी (महतो) समाज, जो 30-40% आबादी का प्रतिनिधित्व करती है, लंबे समय से एसटी (ST) दर्जे की मांग कर रही है। इस समाज की नाराजगी का फायदा टीएमसी को मिल सकता है। वहीं, युवा मतदाता रोजगार की कमी से परेशान हैं और स्थायी नौकरी की मांग कर रहे हैं। पंचायत प्रधान सुखराम सोरेन ने बताया कि सरकार की योजनाओं से महिलाओं को लाभ हुआ है, लेकिन शिक्षित युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी बनी हुई है। बिनपुर-1 ब्लॉक में सिंचाई की कमी किसानों के लिए एक गंभीर समस्या है। चुनाव में टीएमसी का समर्थन महिलाओं से मिल रहा है, जबकि भाजपा युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रही है। पिछले एक दशक में बिनपुर की राजनीति में वामपंथ का पतन और भाजपा का उदय हुआ है, जिससे चुनावी समीकरण बदल गए हैं।
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अगर कुर्मी समाज की मांगें पूरी नहीं होती हैं, तो इसका सीधा प्रभाव चुनावी परिणामों पर पड़ेगा।
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