जुड़शीतल पर्व: मिथिलांचल की सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव
सिर पर बासी जल, मन में स्नेह...जुड़शीतल की परंपरा से गूंजा मिथिलांचल
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मिथिलांचल, भारत में जुड़शीतल पर्व पारंपरिक रूप से मनाया गया, जो शीतलता और स्नेह का प्रतीक है। इस अवसर पर लोग एक-दूसरे को आशीर्वाद देते हैं और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हैं। हालांकि, हरिनगर गांव में पिछले साल की हिंसा के कारण शिव-पार्वती विवाह महोत्सव का आयोजन नहीं हो सका।
- 01जुड़शीतल पर्व का आयोजन मिथिलांचल में पारंपरिक उत्साह के साथ हुआ।
- 02परिवार के बड़े सदस्य छोटे सदस्यों को बासी जल डालकर आशीर्वाद देते हैं।
- 03महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया।
- 04हरिनगर गांव में पिछले साल की हिंसा के कारण शिव-पार्वती विवाह महोत्सव रद्द हुआ।
- 05जुड़शीतल पर्व का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व है।
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मिथिलांचल, भारत में जुड़शीतल पर्व बुधवार को पारंपरिक तरीके से मनाया गया, जो प्रकृति प्रेम और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इस पर्व के दौरान परिवार के बड़े सदस्य छोटे सदस्यों के सिर पर बासी जल डालकर आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि गर्मी में शरीर को शीतलता प्रदान करने का एक प्राकृतिक उपाय भी है। महिलाओं और बालिकाओं ने इस अवसर पर पेड़-पौधों में जल अर्पित कर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। हालांकि, हरिनगर गांव में पिछले सौ वर्षों से आयोजित शिव-पार्वती विवाह महोत्सव इस वर्ष हिंसा के कारण नहीं हो सका। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकारों ने जुड़शीतल पर्व के महत्व और परंपराओं पर चर्चा की। इस पर्व का उद्देश्य न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना है, बल्कि सामुदायिक एकता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देना है।
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जुड़शीतल पर्व से स्थानीय समुदाय को एकजुट होने और पर्यावरण की रक्षा के प्रति जागरूक होने का अवसर मिलता है।
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