बंगाल के मधुमेह मरीजों की चुनावी मांगें: स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता
चुनाव में अपने लिए 'मिठास' तलाश रहे मधुमेह मरीज, इस विशाल समुदाय की भी हैं अपनी शिकायतें और मांगें
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बंगाल में मधुमेह के एक करोड़ से अधिक मरीज आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी समस्याओं को लेकर चिंतित हैं। मरीजों का कहना है कि नई सरकार को मधुमेह के इलाज की बेहतर व्यवस्था, स्कूलों में सुविधाएं और अस्पतालों में पृथक डायबिटीज क्लिनिक स्थापित करने पर ध्यान देना चाहिए।
- 01बंगाल में मधुमेह के मरीजों की संख्या एक करोड़ से अधिक है।
- 02मधुमेह के इलाज की सरकारी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।
- 03स्कूलों में मधुमेह से पीड़ित बच्चों के लिए आधारभूत सुविधाएं नहीं हैं।
- 04प्रत्येक अस्पताल में पृथक डायबिटीज क्लिनिक की स्थापना की मांग।
- 05मधुमेह की दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है।
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बंगाल में मधुमेह के एक करोड़ से अधिक मरीज आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी समस्याओं को लेकर चिंतित हैं। इन मरीजों का कहना है कि अगली सरकार को मधुमेह के इलाज की बेहतर व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। कोलकाता की रंगमंच कर्मी पामेला साधुखां ने बताया कि टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित मरीजों के लिए समाज में कई भ्रांतियां हैं, जिन्हें तोड़ने की आवश्यकता है। आईटी पेशेवर उत्तम दास ने स्कूलों में मधुमेह के प्रति जागरूकता बढ़ाने और आवश्यक सुविधाओं की कमी की ओर ध्यान दिलाया। हावड़ा के संजय दास ने सरकारी अस्पतालों में मधुमेह के इलाज की गुणवत्ता पर सवाल उठाया और पृथक डायबिटीज क्लिनिक की स्थापना की मांग की। गैर-सरकारी संगठन 'डायबिटीज अवेयरनेस एंड यू' के इंद्रजीत मजुमदार ने कहा कि राज्य की कुल आबादी का करीब 15 प्रतिशत मधुमेह से पीड़ित है, और गंभीर सरकारी प्रयासों के बिना इसे नियंत्रित करना मुश्किल होगा।
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इससे मधुमेह मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी, जिससे उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार होगा।
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